Tuesday, August 31, 2010

कोई मुझको ये बताये

" कोई मुझको ये बताये "

कोई मुझको ये बताये ,

आज आसमान में चाँद ठहरा क्यों है ?

रोशनी कम है क्यों चांदनी की,

चाँद पर बदल का पहरा क्यों है ?

आँखें झुकी झुकी सी है,

मेरे महबूब का चेहरा बदला क्यूँ है ?

रंगत कम है क्यों चेहरे का ,

उसपर जुल्फों का पहरा क्यों है ?

माली ने सींचा नहीं पौधे को मगर ,

रंग कलियों का सुनहरा क्यों है ?

कल तलक तो रंगीनियाँ थी यहाँ ,

उजरा हुआ आज ये सहरा क्यों है ?

हवाएं बह रही है रफ्ता-रफ्ता ,

जुल्फ उनका फिर भी लहरा क्यों है ?

भवरों ने रस सारा ले लिया फूलों का ,

फिर भी आज ये चमन महका क्यों है ?

आसमान नें लाख कोसिस की तारों को समेटने की,

आसमान में तारा फिर भी बिखरा क्यों है ?

हमने तो यूँ ही मजाक में कहा था,

जख्म दिल पे उनके गहरा क्यों है ?

दो दिन बिता दिए उनके गम में मगर ,

आज " साहिल " का चेहरा निखर क्यों है ?

-----------------अमित शंकर "साहिल"


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