कोई मुझको ये बताये ,
आज आसमान में चाँद ठहरा क्यों है ?
रोशनी कम है क्यों चांदनी की,
चाँद पर बदल का पहरा क्यों है ?
आँखें झुकी झुकी सी है,
मेरे महबूब का चेहरा बदला क्यूँ है ?
रंगत कम है क्यों चेहरे का ,
उसपर जुल्फों का पहरा क्यों है ?
माली ने सींचा नहीं पौधे को मगर ,
रंग कलियों का सुनहरा क्यों है ?
कल तलक तो रंगीनियाँ थी यहाँ ,
उजरा हुआ आज ये सहरा क्यों है ?
हवाएं बह रही है रफ्ता-रफ्ता ,
जुल्फ उनका फिर भी लहरा क्यों है ?
भवरों ने रस सारा ले लिया फूलों का ,
फिर भी आज ये चमन महका क्यों है ?
आसमान नें लाख कोसिस की तारों को समेटने की,
आसमान में तारा फिर भी बिखरा क्यों है ?
हमने तो यूँ ही मजाक में कहा था,
जख्म दिल पे उनके गहरा क्यों है ?
दो दिन बिता दिए उनके गम में मगर ,
आज " साहिल " का चेहरा निखर क्यों है ?
-----------------अमित शंकर "साहिल"
No comments:
Post a Comment