Tuesday, August 31, 2010

कोई मुझको ये बताये

" कोई मुझको ये बताये "

कोई मुझको ये बताये ,

आज आसमान में चाँद ठहरा क्यों है ?

रोशनी कम है क्यों चांदनी की,

चाँद पर बदल का पहरा क्यों है ?

आँखें झुकी झुकी सी है,

मेरे महबूब का चेहरा बदला क्यूँ है ?

रंगत कम है क्यों चेहरे का ,

उसपर जुल्फों का पहरा क्यों है ?

माली ने सींचा नहीं पौधे को मगर ,

रंग कलियों का सुनहरा क्यों है ?

कल तलक तो रंगीनियाँ थी यहाँ ,

उजरा हुआ आज ये सहरा क्यों है ?

हवाएं बह रही है रफ्ता-रफ्ता ,

जुल्फ उनका फिर भी लहरा क्यों है ?

भवरों ने रस सारा ले लिया फूलों का ,

फिर भी आज ये चमन महका क्यों है ?

आसमान नें लाख कोसिस की तारों को समेटने की,

आसमान में तारा फिर भी बिखरा क्यों है ?

हमने तो यूँ ही मजाक में कहा था,

जख्म दिल पे उनके गहरा क्यों है ?

दो दिन बिता दिए उनके गम में मगर ,

आज " साहिल " का चेहरा निखर क्यों है ?

-----------------अमित शंकर "साहिल"


Sunday, August 15, 2010

मैं






" मैं "

" मैं "
कभी ये सोंचता हूँ
की कौन हूँ " मैं "
खुद से पूछता हूँ
की क्या हूँ " मैं "
ये जिस्म
या रूह हूँ
"मैं "
सबसे पूछता हूँ
की कौन हूँ
"मैं "

किसी का बेटा
किसी का भतीजा
किसी का भांजा
किसी का भाई
किसी का देवर
किसी का नवासा
इन रिश्तों मैं उलझा
खुद से पूछता हूँ
किसका कितना हूँ
" मैं "
जितना सोचता हूँ
उलझ जाता हूँ
" मैं "

वक्त का खिलौना
या ख्वाब का पिटारा ,
एक कठपुतली
या सांस लेता एक ढांचा
अस्थियौं की ईमारत
या खून का बोतल ,
नसों की गांठ
या सांसों की चिमनी ,
या कुछ नहीं हूँ
" मैं "

फिर सोंचता हूँ
हमें क्यों गुमान होता है ?
किस बात का
गुमान होता है ?
इस शरीर का ?
जो इस मिटटी का है ,
या इस धरती का " क़र्ज़ "
जो एक दिन चुकाना होगा !
या इन सांसों का ?
जो है हवाओं का " क़र्ज़ "
फिर सोंचता हूँ
किससे पूछूं ? कहाँ खोजूं ?
ये ताकाश पूरी होगी की नहीं
ये सवाल पूरा होगा की नहीं
फिर
" मैं "

खामोश हो जाता हूँ
ढूंढ़ता हूँ
अपने ही अन्दर
अपने आपको
और
" मैं "
खो जाता हूँ .
--- अमित शंकर .

jajba

जजबा
तुम मिटा दो बेशक
मन्दीरों को
मसजिदो को
चचोँ को
इमारतो को
हम फिर से
बना लेगे इसे
वक्त के साथ
सजा लेगे इसे
पर
कैसे मिटा पाओगे
उस जुनुन को
जो हमारे लहू मे है
जिसका एक कौम है
उस जज्बे को
जो 100 करोर दिलों में
घङकता है
और कहता है
" हिन्दुस्तान "
तुझे सलाम
-अमित शंकर